नदियों का हाल बुरा है
गंगा मैली हो रही, यमुना का हाल बुरा है | कावेरी भी ठीक नहीं, जल रेत संग पड़ा है || हिंडन, बेतवा, घाघरा तलाश रही हैं स्वयं को | सहस्र नदियों को अब, बारिश का आसरा है || कैद हुई बांध में कुछ, कुछ मानचित्र से लापता | गंदगी के बोझ संग, कुछ पूछ रही अपना पता || वरुणा आज सिसक रही, असी का पता नहीं | कृष्णा, गोदावरी मंदाकिनी पूछती हैं पता कहीं || ताप्ती और महानदी, बदल रहीं हैं रूप निरंतर | ब्रह्मपुत्रा और नर्मदा, दिखा चुकीं रूप भयंकर || पर्यटकों की बाढ़ सी, आती है गंगा घाट पर | हँसती हैं नदियां, मानव के क्रिया-कलाप पर || नदियों का जीवन बदला, बदल गया रंग-रूप | कालीदास बना है मानव, विनाश देख है चुप || रोके नहीं कदम जो, आगे विनाश भयंकर होगा | बिन नदियों के ‘दीप’ सोचो क्या मंजर होगा || लहूलुहान कर नदियों को, क्या तुम बच पाओगे | देर किये अगर अब भी, पीछे देख पछताओगे ||