सांस्कृतिक जागरण के अग्रदूत गोस्वामी तुलसीदास

 


अपनी आध्यत्मिक कृति ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से अमर रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास न सिर्फ आध्यात्मिक जागरण के सशक्त हस्ताक्षर रहे हैं अपितु सांस्कृतिक जागरण के पुरोधा के रूप में भारतीय जनमानस के मानसिक पटल पर आज भी उनका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है । धर्मशास्त्र एवं वेदों पर अच्छी पकड़ रखने वाले गोस्वामी जी ने अपने भक्ति काव्य के माध्यम से मुग़ल साम्राज्य में खंडित हो रही धार्मिक मान्यताओं को पुनर्जीवित करने के साथ ही ईश्वर के प्रति आस्था को भी बल प्रदान किया । एक तरफ मुग़ल साम्राज्य के शासक सनातन धर्म को मिटाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ हिंदी साहित्य के इस महान कवि ने रामभक्ति की ऐसी लहर पैदा कर दी जिसने सनातन प्रेमियों को नई ऊर्जा देने का कार्य किया । १६वीं सदी में मुग़ल शासक हिन्दू मंदिरों को तोड़कर हिन्दुओं को सांस्कृतिक चोट पहुँचा रहे थे परंतु तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से हिन्दुओं के घरों में ही भक्ति मंदिर स्थापित कर दिया । ऐसा कहा जाता है कि ‘रामचरितमानस’ की रचना के पीछे उनके आराध्य हनुमान जी का आशीर्वाद था । वाराणसी के तुलसीघाट पर रामभक्ति में डूबे तुलसीदास जी को रामभक्त हनुमान ने दर्शन दिया था, और ऐसा माना जाता है कि ‘रामचरितमानस’ की प्रत्येक चौपाई की रचना उन्होंने हनुमान जी को हृदय में धारण करके किया था । ‘रामचरितमानस’ में, घटनाओं का वर्णन इतना सटीक किया गया है जैसे ये घटनाएं तुलसीदास की समक्ष घटित हुई हों । उन्होंने काशी के प्राचीन ‘संकट मोचन मंदिर’ की स्थापना कर लोगों को भक्ति रुपी उपहार प्रदान किया था जहाँ आज भी भक्त शिरोमणि हनुमान के भक्ति रस का रसास्वादन करने लाखों भक्त पहुँचते हैं ।

हिंदी, अवधी, एवं संस्कृत भाषा पर उनकी पकड़ उनकी रचनाओं से स्पष्ट होती है । वेद और पुराणों में वर्णित जीवन मूल्यों को आत्मसात करने वाले तुलसीदास जी भारतीय सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने वाले ऐसे कवि हैं जिनके लिए धर्म, लोकधर्म से जुड़ा हुआ है । ‘निष्कामता’ भाव को भक्ति की सबसे बड़ी शक्ति बताने वाले तुलसीदास जी लोकधर्म के पक्षधर थे । उन्होंने ईश्वर की सत्ता को कटघरे में खड़ा करने वाले समकालीन कवियों को भी जवाब दिया । उनका मानना था कि ईश्वर रुपी सत्ता तर्क, अनुभव, एवं आगम के माध्यम से भारतीय दर्शन को दृष्टि देने का कार्य करती हैं । ईश्वर की भक्ति कोई पाखण्ड नहीं है, यह सनातन संस्कृति का आधार स्तम्भ है । सनातन संस्कृति में उन्हें आध्यात्मिक चेतना का अग्रदूत भी कहा जाता है । उनके द्वारा प्रदत्त रामरस ने भारतीय संस्कृति को खंडित करने वाली मानसिकता से हिन्दुओं को बचाये रखा । नव रसों से युक्त रामरसायन आज भी हिन्दू धमनियों में प्रेरणापुंज बनकर बहता है जो कुंठा और संत्रास की स्थिति से हमें बचाता है । उनका मानना था कि जो धर्म के स्वरुप पर मुग्ध हो जाएगा, वो अधर्म के रास्ते भरसक नहीं जाएगा । हालाँकि उनका धर्म पाखंड से दूर एक ऐसा धर्म था जिसमें सृजन की क्षमता थी जो आस्था और विश्वास को भक्ति के बंधन से बांधता था, जो धार्मिक मूल्यों के साथ ही सामाजिक मूल्यों से भी जुड़ा था; भले ही यह धर्म आध्यात्मिक पद्धतियों से संचालित होता था परन्तु यह सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों से ओत-प्रोत था । भारत की भूमि को उन्होंने अत्यंत ही पावन बताया है । भारतभूमि में जन्म लेने को वे गौरव की बात समझते थे, उनका कहना थे कि बड़े ही सौभाग्य से इस भूमि पर जन्म लेने का अवसर प्राप्त होता है जहाँ स्वयं भगवान भी जन्म लेने को आतुर दिखते हैं । इस बात को उन्होंने  बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है-

भलि भारत भूमि, भले कुल जन्म, समाज सरीर भलो लहिकै । जो भजै भगवान सयान सोई तुलसी हठ चातक ज्यों गहिकै । ।

आज जब खंडित भारत का स्वप्न देखने वाली शक्तियाँ भारतीय जनमानस के बीच ऊँच-नीच रूपी सामाजिक विद्वेष फैलाकर यह सिद्ध करना चाहती हैं कि बहुत पहले से ही भारतीय समाज में यह भाव विद्यमान है, इसका खंडन तुलसीदास द्वारा रचित इस चौपाई से समझा जा सकता है जो सामाजिक समरसता का बहुत ही सुंदर उदाहारण प्रस्तुत करती है-

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू । कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू । ।

रामसखा ऋषि बरबस भेंटा । जनु महि लुटत सनेह समेटा । ।

इस प्रसंग में तुलसीदास जी स्पष्ट करते हैं कि केवट जब अपने आप को छोटा समझकर ऋषि वशिष्ठ को दूर से प्रणाम करते हैं तो गुरु वशिष्ठ बिना ऊँच-नीच के भाव के उन्हें गले लगाकर भेंट करते हैं । यह चौपाई न सिर्फ भारतीय समाज में ऊँच-नीच के भाव का खंडन करती है अपितु वामपंथी इतिहासकारों द्वारा रचित नकारात्मक विमर्श के जड़ पर प्रहार करती है ।


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