राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण है शिक्षक की भूमिका
समाज और शिक्षा के बीच अत्यंत ही गहरा संबंध है । जिस प्रकार का समाज होगा उस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था होगी, और जिस प्रकार
की शिक्षा व्यवस्था होगी उसी प्रकार का समाज भी निर्मित होगा । इन दोनों ही परिस्थिति
में किसी भी राष्ट्र के लिए एक ऐसे समाज एवं शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता महत्वपूर्ण
होती है जिसका मूल उद्देश्य मूल्यपरक नागरिक तैयार करना होता है । इस महती कार्य में
शिक्षक नामक संस्था का महत्वपूर्ण योगदान नजर आता है । शिक्षक अपने विद्यार्थी को केवल
ज्ञान से समृद्ध एवं संतृप्त नहीं करता है अपितु वह उसके व्यक्तित्व एवं चरित्र को
गढ़ने का कार्य करता है । वह अपने ज्ञान एवं कौशल के द्वारा प्रदत्त शिक्षा के माध्यम
से विद्यार्थी के जीवन में सदैव उपस्थित रहता है, भले ही विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने
के उपरान्त एक नये जीवन में प्रवेश कर चुका हो । शिक्षा ज्ञानार्जन के साथ ही
जीवन पद्धति के निर्धारण में भी अहम भूमिका निभाती है, एवं यह किसी भी देश, काल एवं
परिस्थिति में प्रासंगिक है । किसी भी
सामाजिक व्यवस्था के निर्धारण में वहाँ की शिक्षा व्यवस्था का अमूल्य योगदान होता है,
साथ ही यह व्यवस्था मानव संसाधन विकास की दशा एवं दिशा का निर्धारण करती है । शिक्षक, गुणवत्तायुक्त शिक्षा के माध्यम से
समाज अथवा देश के संचालन में आधार निर्धारण का कार्य करता है । प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक सम्पूर्ण
शिक्षा को भारतीय मूल्यों के साथ प्रसारित करने वाले वे शिक्षक ही हैं जिन्होंने विद्यार्थी
के जीवन को सुगम एवं सार्थक बनाने का कार्य किया है । प्राचीन भारत की गुरु शिष्य परम्परा रही हो, या फिर सर्वपल्ली राधाकृष्णन
से प्रेरित भारतीय शिक्षा व्यवस्था की संकल्पना; दोनों ही शिक्षा के लक्ष्य को विद्यार्थी
के सर्वांगीण विकास से जोड़ती हैं । दोनों ही मूल्य आधारित शिक्षा की वकालत करती हैं,
और दोनों ही इसके लिए शिक्षक नामक संस्था को महत्वपूर्ण मानती हैं । इससे स्पष्ट होता
है कि शिक्षक अपने विद्यार्थी के दशा और दृष्टि दोनों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाता है तो वहीं विद्यार्थी का भाव और स्वभाव का निर्धारण भी उसे प्राप्त हुई शिक्षा
से ही होता है । शिक्षक अपने विद्यार्थी को सिर्फ ज्ञान से संतृप्त नहीं करता है अपितु
उसके अंदर मूल्य-युक्त संस्कारों का बीजारोपण भी करता है । निर्माण एवं प्रलय की दिशा
एवं दशा निर्धारित करने की क्षमता रखने वाला शिक्षक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि
यह समाज के नींव का निर्धारण भी करता है ।
हालाँकि विगत कुछ वर्षों में भारतीय समाज में कई बदलाव देखने को मिले हैं, शिक्षा का क्षेत्र
भी इससे अछूता नहीं है । तकनीकी विस्तार ने विद्यार्थियों
के समक्ष एक ऐसा सूचना-समुद्र प्रस्तुत करने का कार्य किया है जो उसे शिक्षक नामक संस्था
से दूर ले जाने का कार्य कर रही है । आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की दुनिया में प्रवेश
करने वाले असंख्य विद्यार्थियों के लिए शिक्षक अब उतना महत्वपूर्ण नहीं है ।
टेक्स्ट, विजुअल, एवं ऑडियो से सुसज्जित अंतर्वस्तु को पलक झपकते ही प्रस्तुत करने
वाली तकनीकी बहुत तेजी से शिक्षकों की प्रासंगिकता पर प्रश्न खड़े कर रही है ।
तकनीकी विस्तार ने आज एक ऐसा शिक्षण परिदृश्य निर्मित करने का कार्य किया है जहाँ ऑनलाइन
शिक्षा एवं वर्चुअल क्लासरूम को अत्यधिक महत्व दिया जा रहा है । निश्चित रूप से वर्तमान
वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए हम शिक्षण क्षेत्र में बदलाव की माँग को अनदेखा नहीं
कर सकते, और वो भी तब जब सरकार, संस्थान, अभिभावक, एवं शिक्षार्थी सभी को इसमें तात्कालिक
लाभ दिखता हो । यदि हमें वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहना है तो वैश्विक बदलावों
को भी अंगीकार करना होगा, परन्तु इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि वैश्विक लक्ष्य
को प्राप्त करने के चक्कर में हम अपने धरातल को तो कमजोर नहीं कर रहे हैं ।
मूल्यआधारित शिक्षा ही हमारी जड़ों को सशक्त करती है जिसके केंद्र में शिक्षक नामक संस्था
है, इसे भी ध्यान रखने की जरूरत है । शिक्षा के उद्देश्य के केंद्र में आज रोजगार
ने स्थान बना लिया है, एवं विद्यार्थी रोजगारोन्मुखी शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व देने
लगे हैं । विद्यार्थियों का यह कार्य
कदाचित अनुचित नहीं है क्योंकि आज हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जिसमें वैश्विक बाजार
की चुनौतियाँ भी हैं । बाजार-आधारित चुनौतियाँ
मूल्यपरक शिक्षा व्यवस्था पर निरंतर प्रहार कर रही हैं जिसका सामना शिक्षक नामक
संस्था को भी करना पड़ रहा है । एक तरफ
तो शिक्षक को वैश्विक अवसर के लिए अपने विद्यार्थी को कौशलयुक्त शिक्षा प्रदान करने
का अति महत्वपूर्ण कार्य करना है तो वहीं भारतीय मूल्यों का बीजारोपण करना भी अत्यंत
आवश्यक है । रोजगारोन्मुखी शिक्षा की
अनिवार्य शर्त ने शिक्षा प्रणाली को बदलने के साथ ही विद्यार्थी की मानसिकता पर भी
प्रतिकूल असर डाला है जिससे वह जीवन मार्ग पर आने वाली चुनौतियों के सामने अपने आप
को कमजोर महसूस करता है ।
वर्तमान तकनीकी युग में सूचना एवं शिक्षा के लिए अनेकानेक विकल्प उपलब्ध हैं और
विद्यार्थी के लिए किसी भी प्रकार की अंतर्वस्तु से जुड़ना अत्यंत आसान भी है, वह पलक
झपकते ही सूचना के उस अथाह सागर में प्रविष्ट कर लेता है जो भौगोलिक बंधन से सर्वथामुक्त
है । हालाँकि यहाँ उसकी जिज्ञासा तो शांत
हो जाती है परन्तु मशीन आधारित यह दुनिया उसे मानवीय मूल्यों का वह पाठ नहीं पढ़ा पाती
है जो शिक्षक अपने आनुभविक मूल्यों के आधार पर अपने विद्यार्थी के मस्तिष्क में आसानी
से डाल देता है । शिक्षक न सिर्फ अपने
विद्यार्थी के मनःस्थिति को समझता है अपितु उसके जीवनद्वन्द का आंकलन भी आसानी से कर
लेता है । वह अपने विद्यार्थी के ज्ञान-स्तर
को भी भलीभांति जानता है, एवं उसके अनुरूप अपनी शिक्षण पद्धति में आवश्यक बदलाव करता
है । आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस युग
में विद्यार्थी के लिए प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करना जितना आसान है, जीवन मूल्यों
को आत्मसात करना उतना ही कठिन है ।
तकनीकी, शिक्षा प्राप्त करने का एक माध्यम हो सकती है परन्तु यह शिक्षक का विकल्प नहीं
है ।
आज बढ़ती साक्षरता दर हमें गर्व करने का अवसर प्रदान करती है तो वहीं शिक्षा के
स्तर में गिरावट हमें रूक कर आत्ममंथन की ओर इशारा करती है । आत्ममंथन की आवश्यकता इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती
है क्योंकि समग्र सामाजिक ढाँचा शिक्षा रुपी नींव पर ही टिका है, यदि यह नींव कमजोर
हुई तो समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना निश्चित है । निश्चित रूप से यह नींव तभी तक मजबूत
है जब तक शिक्षक नामक संस्था पर समाज का विश्वास है, शिक्षकों को भी इस बात को भलीभांति
समझना चाहिए एवं शिक्षण को मात्र कार्य अथवा व्यवसाय न समझकर उसे अपना कर्तव्य समझना
चाहिए । सरकार एवं समाज को समझना चाहिए कि शिक्षक रुपी संस्था सामाजिक अस्तित्व
के लिए भी आवश्यक है और देश के सर्वांगीण विकास के लिए भी । वर्तमान सन्दर्भ में यह संस्था और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब मनुष्य
बाजार आधारित बदलावों के चपेट में आकर बहुत ही तेजी से सामाजिक ताने-बाने में अप्रासंगिक
हो रहा है । आधुनिक तकनीकी बदलाव को एक
सकारात्मक सोच के साथ अपनाने के लिए शिक्षक भी तैयार है, शिक्षक की यह तैयारी विद्यार्थी
के लिए भी प्रासंगिक है क्योंकि तकनीकी का ज्ञान रखने वाला शिक्षक इससे अपनी शिक्षण
पद्धति को समृद्ध करके ज्ञान का प्रसार आसानी से कर सकता है, और देखा जाय तो वह तकनीकी
ज्ञान न रखने वाले शिक्षक से बेहतर कार्य कर सकता है । सरकार एवं समाज का विश्वास शिक्षक नामक संस्था पर होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि
वही है जो विद्यार्थी को ज्ञान और संस्कार दोनों देकर उसे कुंठा एवं संत्रास से बचा
सकता है, शिक्षक ही है जो विद्यार्थियों में सेवाबोध, कर्तव्यबोध एवं राष्ट्रबोध का
भाव विकसित कर राष्ट्र-निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है ।

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