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मेरी कमीज़ ज्यादा सफ़ेद

                                                        सफ़ेद रंग प्रकृति का सबसे प्रिय रंग है क्योंकि इसमें सभी रंगों को समाहित करने का गुण होता है । यह इन्द्रधनुषी सभी रंगों को ऐसे समेट लेता है जैसे सागर नदियों के जल को । प्रकृति के बाद यह रंग सबसे ज्यादा भारतीय नेताओं को पसन्द है  इसीलिए अक्सर नेता जी काले को सफ़ेद करने में लगे रहते हैं और काले को सफ़ेद करने का खेल जीवन भर जारी रहता है । नेता जी के कपड़े तो मानों सफ़ेदी का प्रतिनिधित्व करते हैं और नेता जी इस रंग के ब्राण्ड अम्बेसडर होते हैं । क्या मजाल भ्रष्टाचार की कोई दाग नजर आ जाए ? अब रिन की सफ़ेदी हो या सर्फ़ एक्सेल की, नेता जी की कमीज हमेशा चमकती रहती है । अब आप कहेंगे कि इसमें बुरा क्या है? सफ़ेद कमीज़ तो चमकेगी ही । रही बात नेता जी की तो वो हमेशा ध...

कब तक लहू बहेगा?

कब तक लहू बहेगा भारत के वीर जवानों का कब तक देखेगा देश ये नंगा नॉच हैवानों का इससे पहले गद्दारों के मंसूबे सफल हो जाये रोज तिरंगा में लिपटा कोई शहीद घर आये कुचलना होगा सिर घर-बाहर के शैतानों का...... हर कोने में विषैले सर्प फन अपना फैला रहे भगत सुभाष की धरती ज़हन्नुम वो बना रहे घड़ियाली आँसू ऐसे कब तक तुम  बहाओगे शहादत पर वीरों के सियासी पारा चमकाओगे रोको क़त्ल अब तो तुम गाँधी के अरमानों का .... सौ कुत्ते मिल शेरों का अब ऐसे न संहार करें छिप कर सूअर के औलाद पीछे से न वार करें जागो दिल्ली के जमींदारों अब तुम न देर करो कह दो वीर जवानों से चुन-२ कुत्तों को ढेर करो सफाया जरुरी है अब उनके ठौर ठिकानों का ...... 

बरसाती मेंढक

चुनावी बरसात में आ जाते हो तुम, कुछ पल के लिए टरटराते हो तुम  चुनावी मौसम बहुत भाता है तुम्हे ,  हर वितर्क पर लार टपकाते हो तुम  कीचड़ से नाता बहुत है पुराना , कीचड़ से ही हमेशा नहाते हो तुम धर्म जाति पर होती है गिद्ध नज़र  जनता को आपस में लड़ाते हो तुम  जैसे ही ख़त्म हो जाता है चुनाव  न जाने कहाँ गुम हो जाते हो तुम 

परिवार

ख़ुशनसीब होते हैं जिनका परिवार होता है, सुख-दुःख बांटने वाला घर-संसार होता है मुश्किलें भी हार जाती हैं जंग उस सख्स से, जिसकी दुनिया में माँ का दुलार होता है बचपन गुजारता है जो ममता की छाँव में, दादा की गोद में दादी की दुआओं में छू लेता है वो आसमान की उचाईयों को, जिसकी दुनिया में पिता का प्यार होता है रूठ जाने पर झट से मना लेती है, सारी गलतियाँ हर बार माँ से छुपा लेती है दुखों के भँवर से निकल आता है वो, जिसकी दुनिया में बहन का दुलार होता है यूँ तो लड़ता है हर छोटी बात पर, उपहार में मिले हुए खिलौनों और सौगात पर दुश्मनों के छक्के छुड़ा आता है वो, जिसकी दुनिया में भाई का प्यार होता है अनजान दुनिया से जीवन में आती है, ताउम्र सुख-दुःख में साथ निभाती है तमाम झंझावातों से लड़ लेता है वो, जिसकी दुनिया में पत्नी का प्यार होता है 

सलाम

हिन्द के जवानों को सलाम लिख रहा हूँ, उनकी वीरता पर कलाम लिख रहा हूँ। शहादत के जिनकी हर बातें हैं अनोखी, गोली भी खाकर जो चढ़ते गये चोटी ।। ऐसे वीरों को आज पैगाम लिख रहा हूँ, हिन्द के जवानों को सलाम लिख रहा हूँ। आज़ादी की खातिर जो मिट गये दीवाने, दुश्मन के लहू से जो लिख गए फ़साने। मौत भी ना रोक सकी जिनके कदम, तिरंगे में लिपटे हुए घर आये  जो दीवाने।। उनकी ज़िन्दगी की उनवाँ लिख रहा हूँ, हिन्द के जवानों को सलाम लिख रहा हूँ। माँ की ममता और बहनों का प्यार, बाबूजी के सब अरमानों का जिनपे था भार।  बच्चों को सोता जो छोड़ गया था, होता था 'दीप' जो किसी के माथे का श्रृंगार ।। ख़त मैं उस वीर के नाम लिख रहा हूँ, हिन्द के जवानों को सलाम लिख रहा हूँ। 

मौसम का बदलता मिज़ाज़ : खतरे की घण्टी

पिछले कुछ वर्षों में मौसम ने जिस तरह से करवट बदला है उससे आने वाले खतरे का अंदेशा होने लगा है। बिन मौसम की बारिश की मार हो या दिन प्रतिदिन चिलचिलाती गर्मी का टूटता रिकॉर्ड, बादल फटने की बढ़ती घटनाएं हो या फिर सैकड़ों को काल के गाल में ले जाने वाली लू का प्रकोप, निश्चित तौर पर हमे आगाह कर रही हैं। प्रकृति से हो रहे छेड़छाड़ ने पुरे इको -सिस्टम को बदल दिया है जिससे प्रतिदिन एक नई चुनौती जन्म ले रही है। इस बदलाव का न सिर्फ हमारे जीवनशैली पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था भी चरमरा सी गई है।  देश में बारिश की कमी की वजह से जहाँ कई राज्य सूखे का दंश झेल रहे हैं वहीं फसलों के उत्पादन में गिरावट ने महंगाई के लिए आग में घी डालने का काम किया है। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर मौसम का मिज़ाज़ क्यों बदल रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? इस प्रश्न का उत्तर निश्चित तौर पर प्रकृति के प्रति हमारे संवेदनहीन रवैये की तरफ इशारा करता है। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर हम विकास की जिस प्रक्रिया को गति देने में लगे हैं वह प्रक्रिया हमें धीरे -धीरे विनाश के तरफ ले जाती दिख ...

किसान

ऐ किसान ! तेरी क्या ख़ूब कहानी है , चेहरे पे उदासी और आँखों में पानी है। भरता पेट संसार का मेहनत से तेरे , खाते तेरी मेहनत का टाटा अम्बानी है। भूखे सोते रातों को बच्चे अक्सर  ही , तेरे घर के चूल्हे पर पकता पानी है। छलते हैं सरकारी वादे और जुमले , सूखा बारिश की तुझे कीमत चुकानी है।