संदेश

मिलावटी ज़हर से मुक्त हो बाजार

  भारतीय बाजार आज मिलावटी उत्पादों से पटा हुआ है | मिलावटी जहर से बने हुए नकली उत्पाद न सिर्फ हजारों लोगों को मौत के चौखट पर पहुँचा रहे हैं अपितु कई ऐसी गम्भीर बीमारियाँ बाँट रहे हैं जो उपभोक्ता के जीवन को दीमक की भांति खोखला कर रही है | तीज-त्योहारों पर मिलने वाली नकली मिठाई हो, या फिर चन्द रुपयों की लालच में आकर बेचीं गयी नकली दवाई, सौन्दर्य प्रसाधन के उत्पाद हों या फिर मिलावटी दूध जैसा जहर, आज नकली उत्पाद शहर के साथ ही ग्रामीण बाजारों तक पहुँच चुका है | फल एवं सब्जी जैसे रोज उपयोग में लाये जाने वाले उत्पाद को भी जहर रुपी रासायनिक पदार्थ के साथ धड़ल्ले से बेचा जा रहा है | फलों एवं सब्जियों को ताज़ा रखने एवं उन्हें समय से पहले तैयार करने के लिए कई तरह के रासायनिक पदार्थ उपयोग में लाये जा रहे हैं जिससे आम उपभोक्ता के समक्ष जीवन संकट उत्पन्न होता दिख रहा है | बड़ी कम्पनियों से लेकर स्थानीय स्तर पर निर्मित उत्पाद, सरकार द्वारा तय मानकों की अनदेखी करते हुए दिख जाते हैं | उत्पादक, विज्ञापनों की चिकनी-चुपड़ी बातों से आम उपभोक्ता को गुमराह कर उत्पाद के साथ धीमा जहर बेच लेते हैं, और हमारा क़ान...

लोकतंत्र का आधार स्तंभ है पारदर्शी चुनाव व्यवस्था

  किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए पारदर्शी चुनाव व्यवस्था अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जाती है | स्वस्थ निर्वाचन प्रक्रिया न सिर्फ लोकतंत्र को मजबूत करती है अपितु संवैधानिक मूल्यों की रक्षा भी करती है | यह प्रक्रिया नागरिकों में निष्पक्ष चुनाव का भाव पैदा करने के साथ ही आदर्श चुनाव व्यवस्था का बोध भी कराती है | इस पूरी प्रक्रिया को सही ढंग से क्रियान्वित करने में चुनाव आयुक्त की अहम् भूमिका होती है | चुनाव आयुक्त द्वारा लिए गये निर्णय न सिर्फ चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं अपितु लोकतंत्र की दशा एवं दिशा भी तय करते हैं | चुनाव आयुक्त किसी दल विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, वह संवैधानिक दायित्व के निर्वहन के लिए स्वतंत्र संस्था का नेतृत्व करता है | चुनाव आयोग के मुखिया के रूप में कार्यरत चुनाव आयुक्त को विधिक एवं संवैधानिक अधिकार प्राप्त होते हैं जिससे वह देश में विभिन्न स्तर पर चुनाव को सम्पन्न करा सके | अनेक अवसरों पर विपक्षी दल चुनाव आयुक्त को कटघरे में खड़ा करते आये हैं, एवं सत्तापक्ष को फायदा पहुँचाने का आरोप लगाते रहे हैं | तमाम आरोप-प्रत्यारोप के बीच चुनाव होते रहे हैं, स...

सामाजिक ढांचे को मजबूत करेगा आर्थिक आरक्षण

  सामान्य वर्ग के गरीब व्यक्ति को सरकारी नौकरी एवं उच्च शिक्षण संस्थान में १० प्रतिशत आरक्षण दिये जाने के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने लाखों प्रतिभाओं को नेपथ्य में खो जाने से बचाने का कार्य किया है, जिनकी प्रतिभा गरीबी की धुंध में खोकर दम तोड़ देती थी | वर्ष २०१९ में जब केंद्र सरकार ने १०३ वें संविधान संशोधन के जरिये सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला किया तब कुछ राजनैतिक नेताओं ने इस फैसले को दलित एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करार दिया | आज जब सर्वोच्च न्यायालय ने आर्थिक आधार पर मिलने वाले आरक्षण को हरी झण्डी दिखाया है, तब भी वरिष्ठ नेता उदित राज जैसे लोग इसके पीछे भेदभाव की बात कर रहे हैं | प्रधान न्यायाधीश यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा बहुमत से दिया गया फैसला सामाजिक समरसता की बुनियाद मजबूत करेगा, साथ ही आर्थिक बेड़ियों में जकड़े उस वर्ग को अवसर देगा जिनकी मूल समस्या को अबतक अनदेखा किया जाता रहा है | जातिगत आधार पर मिलने वाले आरक्षण के अतिरिक्त १० प्रतिशत आरक्षण सामान्य जाति में जन्म लेने वाले उन व्यक...

देश के लिए घातक है ‘मुफ़्त’ की सियासत

  कुछ ही दिनों में देश के दो प्रमुख राज्य लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव के साक्षी बनेंगे | चुनाव आयोग निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न कराने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है, परन्तु विगत कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में ‘मुफ़्त’ की घोषणाओं ने न सिर्फ चुनाव सुधार के लक्ष्य को प्रभावित किया है अपितु निष्पक्ष मतदान के उद्देश्य पर भी असर डाला है | प्रधानमंत्री महोदय से लेकर सर्वोच्च न्यायलय तक ‘मुफ़्त घोषणाओं’ पर चर्चा कर चुके हैं | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ‘रेवड़ी कल्चर’ को देश के लिए घातक कहा था जबकि सुप्रीमकोर्ट इससे जुड़ी याचिका को मंजूर कर उसे ३ न्यायधीशों की बेंच को भेज चुका है | कुछ समय पहले ही सुप्रीमकोर्ट ने सभी राजनैतिक दलों से इस सन्दर्भ में सुझाव माँगे थे |  विगत दिनों हुई एक सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि राजनैतिक दलों द्वारा मुफ़्त उपहार देने वाली योजनाओं से सरकार को 'आसन्न दिवालियापन' की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है | सबके बीच सभी राजनैतिक दलों ने इस प्रमुख मुद्दे के प्रति जिस प्रकार से उदासीनता दिखलाया है, देश की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर पड़ सकता है |...

ज़िंदगी का सफ़र

खिड़की से दिखा जो, आसमाँ समझ लिया | साथ में तन्हा भीड़ थी , कारवां समझ लिया || ज़िन्दगी के सवालों में, उलझा हुआ था कभी | आसान से सवालों को,  इंतहां समझ लिया || खुद से दूर होकर जब, तलाशता रहा खुशियाँ | किराये के मकां को ही, आशियाँ समझ लिया | ठोकरों ने सिखाया,  सम्भलकर चलना मुझे | ठोकरों को जब मैंने,  हमनवां समझ लिया || वक्त ने दिखाये 'दीप', ज़िंदगी के हजारों रंग | ज़िंदगी का हर लम्हा, हसीं दास्तां समझ लिया ||

तकनीकी युग में शिक्षक की प्रासंगिकता

शिक्षक किसी भी समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | शिष्य के बौद्धिक विकास के साथ ही उसके चरित्र निर्माण का अहम् दायित्व भी गुरु नामक संस्था पर निर्भर करती है | प्राचीन काल से लेकर अबतक शिक्षण व्यवस्था में अनेकानेक परिवर्तन देखने को मिले हैं, परन्तु बदलते परिवेश में भी गुरु कभी भी अप्रासंगिक नहीं हुआ है | आज के तकनीकी युग में शिक्षक का कार्य एवं दायित्व दोनों ही प्रभावित हुआ है, परन्तु इससे शिक्षक की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है | शिक्षण-प्रशिक्षण के बदलते स्वरुप ने शिक्षक के सामने चुनौती अवश्य प्रस्तुत किया है, परन्तु आदर्श शिक्षक तकनीकी बदलाव को शिक्षण-पद्धति के साथ जोड़कर निरन्तर क्रियाशील दिखता है | ‘वर्चुअल क्लासरूम’ के इस युग में लोग गुरु जैसी संस्था पर प्रश्न उठा रहे हैं, और आधुनिक शिष्यों के लिए गुरु जैसी संस्था का महत्त्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है | ‘गुरु’ के स्थान पर ‘गूगल’ के महत्त्व को बढ़ता देख लोग गुरु जैसी महत्वपूर्ण संस्था की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठा रहे हैं, जो कदापि उचित नहीं है | आज के इस युग में निश्चित तौर पर ‘मेटा’ को महत्त्व दिया जाना चाहिए, परन्तु इससे...

मात्र भौगोलिक इकाई नहीं हैं नदियां

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  नदियों का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है | भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता नदियों के किनारे पुष्पित पल्लवित हुई हैं | हमारे वेद-पुराण नदियों की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं जबकि धार्मिक अनुष्ठानों के लिए नदी तट को अत्यन्त शुभ बताते हैं | भारतीय सभ्यता के विकास की साक्षी नदियाँ, भारतीय ऋषियों के तप की भी साक्षी रही हैं | नदियों का हमारे सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है | नदियाँ हमारे लिए मात्र भौगोलिक इकाई नहीं हैं अपितु सृष्टि के सृजन एवं संचालन दोनों में ही नदियों की महती भूमिका परिलक्षित होती है | नदियाँ मात्र जल-स्रोत नहीं है, यह समग्र में एक पारिस्थितकीय तंत्र भी है जिसमें अनेकों जलचर निवास करते हैं | प्राचीन काल से ही नदियाँ भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में भी सहभागी रही हैं | परन्तु विगत कुछ वर्षों से नदियों के मुक्त-प्रवाह के साथ ही इनके जल की गुणवत्ता में नकारात्मक बदलाव देखने को मिला है | नदियों को ‘माँ’ कहकर पूजने वाले भारत में नदियों की दयनीय स्थिति भविष्य के लिए सुखद सन्देश नहीं हैं | ऐतिहासिक महत्त्व वाली अनेक नदियों का ‘नाले’ में परिवर्...