कब तक ?


हे काली ! तुम ले लो फिर,
 इस धरती पर अवतार।
कब तक होगी बेटी यहाँ,
नरपिशाचों की शिकार।।
कब तक होता रहेगा माँ,
मासूमों का बलात्कार।
हे काली ! तुम। ....
नरभक्षी दरिन्दों ने माँ,
इस कदर कहर मचाई है।
एक बेटी के जिस्म को,
आज फ़िर से नोंच खाई है।।
हे रणचंडी ! उठा लो तुम,
फिर से अपनी तलवार।
हे काली ! तुम। .....
मानवता के दुश्मनों ने,
इंसानियत शर्मसार किया है।
एक पापा की गुड़िया संग,
आज फिर बलात्कार किया ।।
रौद्र रूप में आकर तुम,
कर दो पापियों का संहार।।
हे काली ! तुम। ....
रूह कँपाती घटनाएँ माँ,
नितदिन ही बढ़ रही हैं।
रावण राज में सुरक्षित सीता,
अपनों से भी डर रही हैं।
जन्म देने वाली जननी क्यूँ,
सहती यह बर्बर व्यवहार।।
हे काली ! तुम। ....
कोर्ट कचहरी के चक्कर में,
परिजन होते बेबस लाचार।
नमक छिड़कते दर्द पर नेता,
मूक-बधिर बनी सरकार। 
कलयुग अपने चरम पर है,
पापी कर रहे हद पार।।
हे काली ! तुम। ....



    

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