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गिरगिटों ने रंग बदलना छोड़ दिया ( व्यंग्य )

अब गिरगिट रंग नहीं बदलते । अरे ! ये क्या ? आप किस सोच में पड़ गए । बचपन से ही सुनते आ रहे थे की इस दुनिया में गिरगिट बहुत तेजी से रंग बदलते हैं । आप गिरगिटों के रंग बदलने वाली बात को इतनी बार सुन चुके होंगे की आप के जेहन में गिरगिटों के रंग बदलने वाली बात एकदम से बैठ गयी होगी । आप में से कई भाई तो उन्हें रंग बदलते देख भी चुके होंगे । कुछ उत्सुकतावश तो कुछ दोस्तों के सामने डींगे भरने के लिए की उन्होंने गिरगिटों को रंग बदलते हुए प्रत्यक्ष देखा है । कुछ के लिए तो यह एक बरी उपलब्धि होगी । बेचारे गिरगिट ! सदियों से इंसान द्वारा दिए जा रहे उलाहनो को सुनने के लिए विवश थे । उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था । उन्हें लगता था की उन्हें नाहक ही परेशां किया जाता है । लेकिन पिछले कुछ दिनों से गिरगिटों ने पूरी तरह से रंग बदलना छोड़ दिया है । अब आप सोच रहे होंगे की उनके यूनियन लीडर ने रंग बदलने के लिए मना किया होगा या ...

सेवा फोबिया (व्यंग्य )

आजकल समाज सेवा रूपी फोबिया खूब देखने को मिल रही है । नेता हो या परेता , माफिया हो या डॉक्टर हो , वकील या फिर कोई व्यापारी । अधिसंख्य लोग इस रोग से पीड़ित नजर आते है । नेताओं में तो चुनाव आते ही यह रोग अचानक बढ़ जाता है और वे इस मर्ज की दवा के लिए इधर उधर भटकना शुरू कर देते है । इस कार्य के लिए उनके चमचे दिन रात मेहनत करते है और कहीं न कहीं नेताजी के मर्ज की दवा खोज ही लेते है । अब आप ही बताइए , भारत में भूखे नंगो अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को खोजना कठिन है क्या ? सो नेताजी किसी न किसी बहाने कभी कम्बल बांटकर तो कभी साईकिल या फिर साडी बांटकर अपना रोग दूर कर लेते है । उत्तर प्रदेश में   कई नेता सेवा फोबिया के गिरफ्त में आ चुके है । सेवा फोबिया का यह रोग अब तो चुनाव बाद ही ठीक होगा । हाल फिल हाल में भाई लोग भी इस वायरस के चपेट में आ चुके है । सेवा फोबिया का वाइरस इतना तगड़ा है की जब भी इससे संक्रमित व्यक...

सेवा phobiya

कितना बदल गया इंसान

खुद को खुदा समझे , फरिश्तों को शैतान । पाप को गरिमा समझे , पतन को उत्थान । । हैवानियत की हद पर कर , बन गया हैवान । कितना बदल गया इंसान ... निजी स्वार्थों के खातिर , स्वजनों की बलि चढाये । पल में बदल मुखौटा , गिरगिट सा रंग दिखाए । । जिसमे हो हित साधन उसका , माने उसको ज्ञान । कितना बदल गया इंसान ... लोभ द्वेष पाखंड की , रोज ही धुनी रमाये । झूठ कपट और हिंसा संग , अपना कदम बढ़ाये । । सत्य अहिंसा प्रेम से आज , बन बैठा अनजान । कितना बदल गया इंसान ... सज्जनों की अनदेखी कर , दुर्जन को गले लगाये । प्रीति परायी के खातिर , खुद का घर जलाये । । आगे बढ़ने की होड़ में , बन बैठा पाषाण । कितना बदल गया इंसान ...