संदेश

हंगामा क्यों है बरपा ....

                                   हमारे देश में हंगामा करने वालों की कोई कमी नहीं है । लोग हर बात पर हंगामा करने के लिए तैयार रहते हैं । बिजली नहीं मिले तो हंगामा, पानी न मिले तो हंगामा, सड़क से लेकर संसद तक बस हंगामा ही हंगामा । हमारे माननीय तो पैसे ही हंगामा करने की लेते हैं । जब भी कुछ समझ में नहीं आता है तो संसद में हंगामा करके संसद को स्थगित करा देते हैं , फिर अगला हंगामा इस बात पर करते हैं कि पिछले हंगामें की वजह से संसद नहीं चली और यह हंगामा तब तक जारी रहता है जब तक हंगामे के लिए कोई नया विषय न मिल जाए । हंगामा भी कई प्रकार का होता है जिसमें सबसे प्रमुख है राजनीतिक हंगामा । इस हंगामें का मकसद होता है सिर्फ हंगामा करना । वैसे तो हर प्रकार के हंगामें के पीछे राजनीतिक हंगामा ही होता है परन्तु राजनीतिक हंगामें में सभी माननीयों का एक समान फायदा होता है । कुछ देर हो हल्ला करने के बाद अगले दिन तक आराम करने का मौका मिल जाता है और फिर सभी सदस्य एक दुसरे को मन ही मन धन्यवाद देते हुए अग...

हम भक्तन के, भक्त हमारे

हमारे देश में भक्तों की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं । इनमें से कई का अस्तित्व सदियों पुराना है तो कई हाल ही में विकसित हुई हैं । कुछ एक प्रजाति के अस्तित्व का पता लगाना बेहद ही कठिन है क्योंकि इस प्रजाति के भक्त केंचुए की तरह छिपे होते हैं और अनुकूल बरसात होते ही अवतरित हो जाते हैं । ऐसे भक्तों को न भगवान से मतलब होता है और न ही धर्म गुरुओं से ।   प्राचीन काल वाले भक्तों की संख्या लगभग नगण्य हो चुकी है, ऐसे भक्त भगवान के भक्त कहलाते हैं । फिलहाल ये हिमालय की गुफाओं में मृतप्राय स्थिति में पाये जा सकते हैं । ऐसे भक्तों को या तो भगवान अपने पास बुला चुके हैं या फिर इस प्रजाति का अस्तित्व बनाये रखने के लिए कुछेक को धरती पर रखे हुए हैं । इस श्रेणी के भक्तों के लिए भगवान की भक्ति ही सबकुछ होती है । भगवान अपने भक्तों के हर दुःख दर्द को अपना समझते हैं । इस श्रेणी के भक्त अपने भगवान से निःस्वार्थ प्रेम करते हैं और भगवान भी अपने भक्त का हमेशा ध्यान रखते हैं । हाल ही में नासा ने ऐसे भक्तों की खोज के लिए अपनी एक टीम का ऐलान किया है जो यह पता लगाएगी की प्रतिकूल वातावरण होते हुए भी इस ...

हिन्दी राग़

                                    आज वर्षों बाद एक कवि सम्मलेन में जाने का मौका मिला । इस सम्मलेन का आयोजन हिंदी की रोजी रोटी खाने वाली एक बड़ी संस्था ने किया था । हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस कवि सम्मलेन में कई मूर्धन्य कवि पधार रहे थे। इन मूर्धन्यों के बीच मेरा कद इतना बड़ा ही था जितना किसी हिंदीभाषी क्षेत्र से आये छात्र का अंग्रेजी माध्यम से पढाई करने वाले छात्रों के बीच होता है । अंग्रेजियत के माहौल में पले बढ़े इन महानुभावों के बीच   बैठकर   मेरा वही हाल हो रहा था जैसाकि किसी निगमीय कार्यालय में साक्षात्कार के लिए बैठे हिन्दीभाषी प्रतिभागी का होता है । बराबर की कुर्सी पर मुझ जैसे निरीह प्राणी को देखकर एक सज्जन से नहीं रहा गया , परिणाम स्वरुप उनके शब्द बाण का मुझे शिकार होना पड़ा । मसलन आप कहाँ से हैं ? आपको   पहले   कभी   नहीं   देखा  , क्या आप हिंदी में कवितायेँ ... ? इत्यादि प्रश्न सुनकर मै दंग रह गया। भारत जैसे देश में जहाँ हिन्दी दिवस मना...

असली दुकान

                                      क्या आप समस्याओं से परेशान हैं ? क्या आपको मनचाहा प्यार नहीं मिल रहा ? या फिर तमाम कोशिश के बावजूद सफलता नहीं मिल रही ? तो आज ही आप हमारे नजदीकी दुकान में संपर्क करें । अरे ! आप उधर कहाँ जा रहे ? आपका ध्यान किधर है ? बाबा बंगाली की असली दुकान इधर है । नक्कलों से सावधान रहें । सिर्फ हमारी दुकान ही बाबा जी की असली दुकान है इसलिए नक्कलों से सावधान रहें ।  जी हाँ ! भारत जैसे विविधताओं वाले देश में हर गली हर चौराहे और जिले से लेकर प्रदेश तक ऐसी असली दुकानों की भरमार है । इन दुकानों में आपके हर मर्ज की दवा भी उपलब्ध है । हर दुकानदार बस इस बात की प्रतीक्षा में लगा होता है कि आप जैसा ग्राहक सिर्फ एक बार उसके दुकान में आ जाए फिर क्या मजाल उसका कि वह दूसरी दुकान की तरफ रुख कर सके । ये दुकानें आपके हर समस्या का समाधान करने का सौ फीसदी दावा करती हैं और तो और बाबा बंगाली की दुकान तो समस्या न ख़त्म होने की दशा में एक मोटी रकम देने का भी दावा करती है । ह...

जाँच जारी है जनाब

कहते हैं सच को लाख छुपाया जाय यह छुपता नहीं है । यह किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है ।   भले ही इसे सामने आने में सालों लग जाय और इस सच को सामने लाने का काम किसी न किसी जाँच विभाग का होता है जिसे बाल की खाल निकाल कर सत्य की जड़ तक पहुँचना होता है । अब आप कहेंगे की आप के पड़ोसी शुक्ला जी भी तो हमेशा बाल की खाल निकालते रहते हैं । मसलन मोहल्ले में किसके यहाँ कौन आया? कहाँ से आया ? किस काम से आया ? इत्यादि का पता लगाकर ही दम लेते हैं । जाँच-पड़ताल की इस शोध उपलब्धि की प्रक्रिया में मन्दिर के घंटे की तरह कई बार बज भी चुके हैं फिर भी अपना काम बड़ी तल्लीनता के साथ करते हैं ।    खैर ! हमारे देश में कुछ जाँच इस शिद्दत के साथ की जाती है कि जब जाँच पूरी होती है तो जिसकी जाँच चल रही होती है वो दूसरी दुनिया में जाँच करा रहा होता है  और कभी कभी तो जाँच करने वाले की ही जाँच की नौबत आ जाती है । बिहार को ही लें, कुछ साल पहले पशुओं का चारा कोई खा गया था । अब खाने वाली चीज को किसी ने खा लिया तो इसमें हाय तौबा की नौबत कहाँ से आई, लेकिन नहीं ! जाँच तो जरुरी थी जनाब । ज...