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प्लास्टिक कचरे का बढ़ता बोझ

पर्यावरण के समक्ष उपस्थित वर्तमान चुनौतियों में प्लास्टिक जनित चुनौती सर्व-प्रमुख है | प्लास्टिक किसी न किसी रूप में हमारे दैनिक गतिविधियों में इस प्रकार से सम्मिलित हो चुका है कि तमाम प्रयत्न के बावजूद हम अपने जीवन से इसे निकाल नहीं पा रहे हैं | एक तरफ सरकार द्वारा ‘प्लास्टिक मुक्त भारत की’ कोशिशें की जा रही हैं वहीं दूसरी तरफ प्लास्टिक कचरे का लग रहा अम्बार भविष्य में एक गम्भीर परिणाम की तरफ इशारा कर रहा है | आज सिंगल यूज़ प्लास्टिक के प्रयोग को रोकना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है | केंद्र एवं राज्य स्तर पर प्लास्टिक का उपयोग रोकने के लिए कई कानून भी लागू हैं परन्तु इनका प्रभावी असर देखने को नहीं मिलता है | सरकार द्वारा निर्देश जारी होने के बाद भले ही कुछ दिनों तक लोग प्लास्टिक के उपयोग से बचते हैं परन्तु कुछ दिनों के बाद ही सब सामान्य हो जाता है | सरकारी मशीनरी की सक्रियता कम होती जाती है एवं प्लास्टिक उत्पाद निर्माता कम्पनियों के हौसले बुलन्द होते जाते हैं | दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति एवं इण्डियन पाल्यूशन कंट्रोल एसोसिएशन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार सालाना भारत में ३४ लाख टन प्...

अमर शहीदों के शौर्य और बलिदान की दस्तावेज प्रस्तुत करती फ़िल्में

23 मार्च, 1931 भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में वह तिथि है जो आज भी हमें आज़ादी का मूल्य समझाती है, साथ ही हँसते-हँसते फांसी के फंदे को गले लगा लेने वाले अमर बलिदानियों के त्याग और बलिदान की याद दिलाती है | यह तिथि हमें भारत माँ को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने वाले उन वीर शहीदों की याद दिलाती है जो भारतीय स्वतंत्रता की पटकथा लिखते हुए सदा के लिए खामोश हो गये | भारतीय स्वतंत्रता के नायकों की जब भी बात होगी, अमर शहीद भगत सिंह की जरुर बात होगी | शहीद भगत सिंह का व्यक्तित्व न सिर्फ भारतीय जनमानस में क्रांति का ‘इंकलाब’ पैदा करता है अपितु फिल्मकारों को भी खींचता है | आजादी के लगभग 75 वर्ष बाद भी स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि को केंद्र में रखकर फ़िल्में बन रही हैं जिनमें भारतीय स्वतंत्रता की पटकथा लिखने वाले नायकों के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं को रेखांकित किया जाता है | यह विषय आजादी के लगभग 75 वर्ष पूरा होने के बावजूद न सिर्फ फिल्म निर्माताओं को अपनी तरफ खींचता है अपितु भारतीय जनमानस में आज़ादी के संघर्षों से जुड़ी मुख्य घटनाओं सम्बन्धित संचार भी करता है | बड़े पर्दे पर ‘शही...

सूरजकुण्ड मेला : नये सन्दर्भों में परम्परा का ताना- बाना

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देश के प्रमुख लक्खी मेलों में शुमार ‘सूरजकुण्ड अन्तर्राष्ट्रीय क्राफ्ट मेला’ एक आधुनिक लोक सम्मेलन है । दिल्ली से सटे हरियाणा के शहर फरीदाबाद को सूरजकुण्ड मेले के आयोजन के लिए भी विशेषतौर पर जाना जाता है । इस मेले में न सिर्फ परम्परागत कलाओं की जीवन्त झाँकी देखने को मिलती है बल्कि कई मायनों में इस मेले से आधुनिकता की भीनी- भीनी खुश्बू भी आती है, ऐसा लगता है जैसे मेले में गाँव और शहर दोनों के रंग मिलाकर किसी ने चित्रकारी की हो । मेले का नैसर्गिक स्वरूप हो या फिर आधुनिकता का तड़का, ४० एकड़ में फैले मेला परिसर में दोनों का बोध होता है । एक तरफ जहाँ यह मेला ग्रामीण कलाकारों को मंच प्रदान करता है वहीं दूसरी तरफ शहरी लोगों के रूप में आधुनिकता से ओत- प्रोत दर्शक भी । प्रतिवर्ष लाखों आगन्तुकों को अपनी तरफ खींचकर ले आने वाले इस मेले में विदेशी सैलानियों की संख्या भी हजारों में होती है । सार्क देशों के अलावा अन्य पड़ोसी देशों की सहभागिता इस मेले को न सिर्फ अन्तर्राष्ट्रीय दर्जा प्रदान करती है अपितु यह विश्व का सबसे बड़ा क्राफ्ट मेले का दर्जा भी हासिल कर चुका है । सूरजकुण्ड मेला प्राधिकरण हरियाणा एवं...

हमने देखा है

  हमने देखा है यू पी को  बदलते  हुए, आगे बढ़ते हुए इसको  संवरते   हुए | छूट गया था राह में जो पीछे कभी, तेज चलते हुए इसको निखरते हुए || हमने देखा है ……. राम की अयोध्या भी खुशहाल है, मेरी काशी का भी बदला हाल है | सुनाई देने लगी मंदिरों की घंटियाँ, ध्वज सनातन का फिर फहरते हुए || हमने देखा है …… नफरतों ने जलाये थे जो घर कभी, फिर से बनते हुए उसे संवरते हुए | कबीर लड़ते रहे थे उम्र भर जिससे, जमी बर्फ को दिलों से पिघलते हुए || हमने देखा है … चल पड़ा है जो मंजिल की ओर, देख सकते नहीं अब ठहरते हुए   | चारों दिशाओं में फैलेगी खुश्बू , हवाएं भी कहेंगी ये गुजरते हुए   || हमने देखा है … चंद कदम चले हैं चलते ही जाना है, सपनों को ‘दीप’ सच कर दिखाना है | बंजर सी जमीं में फुंट रहे हैं अंकुर, देखना है इसमें फूल निकलते हुए || हमने देखा है …    

जनहित में त्याग ( व्यंग्य )

जनहित में त्याग करना कोई माननीयों से सीखे | मजाल है कि जनहित के मामले में इनसे कोई अनदेखी हो जाय | जनता की सेवा के लिए दिन-रात एक कर देने वाले माननीय जनहित को ध्यान में रखकर अपनी कुर्सी का त्याग एक मिनट में कर देते हैं, बशर्ते दूसरी पार्टी में जन-कल्याण का रास्ता खुला हो | जनता की सेवा को सर्वोपरि मानने वाले महोदय क्या कुछ नहीं करते हैं, राजनीति जैसे कठिन पेशे में अपने बेटे-बेटी, भाई-भतीजा यहाँ तक कि दूर के रिश्तेदार को भी लेकर आते हैं जिससे आम जनता को किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े, साथ ही अवसर मिलने पर वे अपने पूरे कुनबे को त्याग के लिए प्रेरित कर सकें | आखिर जनहित का मामला जो है | जनता के लिए उनका कुछ कर्तव्य है | माननीय जैसा त्यागी तो दधिची जी भी नहीं थे | उन्होंने तो सिर्फ अपनी हड्डियों का दान किया था जबकि माननीय उस कुर्सी का परित्याग कर देते हैं जिसमें उनकी आत्मा निवास करती है | ऋषि दधिची ने तो केवल अपनी हड्डियों का त्याग किया था, माननीय तो पूरे परिवार, रिश्तेदार, एवं समर्थकों के साथ त्याग करने को आतुर दिखते हैं | कुछ माननीयों के लिए यह त्याग पंचवर्षीय योजना की तरह होता है तो व...

तकनीकी ने बदला चुनाव प्रचार का परम्परागत तरीका

  कोविड की तीसरी लहर के आशंका के बीच ही भारतीय निर्वाचन आयोग ने पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की तिथियों का ऐलान कर दिया है | इसके साथ ही आयोग द्वारा प्रचार के लिए एक दिशा-निर्देश भी जारी किया गया है जिसने इन राज्यों में चुनावी ताल ठोकने जा रहे राजनीतिक दलों को प्रचार के परम्परागत तरीकों को छोड़कर ‘वर्चुअल प्रचार’ की तरफ़ कदम बढ़ाने को विवश कर दिया है | भले ही ये दिशा-निर्देश आगामी १५ जनवरी तक के लिए है परन्तु कोरोना की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि राजनैतिक दलों को रैली एवं पदयात्रा की अनुमति मिलना सम्भव नहीं है, एवं सभी राजनैतिक दलों को संचार माध्यमों के साथ ही चुनाव प्रचार को आगे बढ़ाना होगा जिसमें सोशल मीडिया की भूमिका अहम होगी | आज सोशल मीडिया न सिर्फ लाखों वोटर को प्रभावित करने की ताकत रखती है अपितु मुख्य धारा की मीडिया को भी दिशा-निर्देशित करने की क्षमता रखती है | किसी नेता द्वारा किया गया एक ‘ट्विट’ सभी मीडिया को उस सूचना के आस-पास प्रमुख समाचार देने को मजबूर कर सकता है तो वहीं फेसबुक पर साझा किया गया वीडियो लाखों उपभोक्ताओं के विचारों को प्रभावित करने...

बाजारवाद और उपभोक्ता संरक्षण

बाजार की दृष्टि से भारत विश्व के तमाम देशों के लिए सबसे अधिक संभावनाओं वाला क्षेत्र है | उत्पाद बनाने वाली सभी बड़ी कम्पनियां न सिर्फ भारत के बाजार में पैठ बनाने के लिए तरह-तरह के हथकण्डे अपनाती हैं अपितु बाजार विस्तार के लिए लगातार प्रयासरत दिखती हैं | वैश्वीकरण के बाद से भारत का उपभोक्ता बाजार विश्व के तमाम देशों के लिए खुल गया जिससे उत्पाद अथवा सेवा प्रदान वाली विदेशी कम्पनियों ने भारतीय बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करना शुरू कर दिया | कुछ विदेशी कम्पनियों ने सस्ते उत्पाद के जरिये भारतीय उत्पादों को बाजार से लगभग बाहर कर दिया तो वहीं कुछ भारतीय कम्पनियों ने बाजार में बने रहने के लिए अपने उत्पाद की गुणवत्ता से समझौता करना शुरू कर दिया | फलस्वरूप उत्पाद अथवा सेवा की उपलब्धता तो बढ़ी परन्तु उपभोक्ता हितों पर भी व्यापक असर देखने को मिला | बाजारवाद की बढ़ती संस्कृति ने उपभोक्ता हितों को सर्वाधिक प्रभावित किया है |   अधिक मुनाफे की चाह ने उपभोक्ता हितों को हाशिए पर ले जाने का कार्य किया है, साथ ही मिलावटी अथवा नकली उत्पादों की समस्या से भी दो-चार होना पड़ा है | त्योहारों के समय अक्सर ही ...