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मानसिक प्रदूषण फैलाते टीवी डिबेट

  विगत कुछ वर्षों से समाचार चैनलों पर समसामयिक विषय पर ‘बहस’ को अनिवार्य रूप से दिखाया जा रहा है | भले ही इस चर्चा-परिचर्चा के पीछे चैनल का आर्थिक गणित छुपा हुआ है परन्तु देखा जाय तो ‘टीवी डिबेट’ ने देश के सामाजिक गणित को सबसे अधिक प्रभावित किया है | किसी भी लोकतान्त्रिक देश में किसी विषय पर चर्चा करना, स्वस्थ लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करता है परन्तु जिस प्रकार से समाचार चैनलों पर चर्चा होती है, निश्चित रूप से यह मानसिक प्रदूषण को फ़ैलाने का कार्य करता है | इन चर्चाओं के पीछे न सिर्फ समाचार चैनल का एक ‘एजेंडा’ छिपा हुआ दिखलाई देता है अपितु कई बार यह चर्चा किसी प्रमुख मुद्दे से ध्यान भटकाने का कार्य करती है | हास्यास्पद तब होता है जब एक ही विशेषज्ञ विभिन्न विषय पर चर्चा करता हुआ नजर आता है, ऐसे में विषय की गम्भीरता प्रभावित होना स्वाभाविक है | कभी-कभी तो न्यूज़ एंकर पक्ष या विपक्ष की तरफ से बोलता हुआ नजर आता है जिससे समाचार चैनल की वस्तुनिष्ठता प्रभावित   होती है | किसी भी विषय पर चर्चा करते समय, चर्चा को राजनीतिक रंग देना आज सामान्य बात है परन्तु इससे न तो विषय के साथ न्याय होता...

जल स्रोतों को बचाना जरुरी

पिछले कुछ वर्षों में देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों में पेय जल का संकट देखने को मिला है वहीं ग्रामीण क्षेत्र भी सूखते जलस्रोतों को देखने को विवश दिखे हैं | एक तरफ गंगा, यमुना, कावेरी, एवं नर्मदा जैसी बड़ी नदियों का स्वतन्त्र जल प्रवाह अवरूद्ध होता दिखा है वहीं वर्षों से ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहे कुएं एवं नलकूप का जल स्तर भी बेहद नीचे पहुँच चुका है | ताल, तलैया जहाँ बीते दिनों की बात हैं वहीं देश की प्रमुख झील सूखे का दंश झेलने को विवश हैं | तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद छोटे तालाब एवं पोखर भी दयनीय स्थिति में ही दिखते हैं | जल स्रोतों के रूप में उपलब्ध लगभग सभी विकल्प आज गम्भीर संकट का सामना कर रहे हैं | सरकारी तंत्र की अनदेखी एवं आम जनमानस की उपेक्षा से भले ही जल स्रोत संकट ग्रस्त दिखते हैं परन्तु वास्तविकता यह है कि इससे पूरा जीवन तंत्र ही खतरे में है | जल ही जीवन है, सदियों पुरानी यह उक्ति हमारे जीवन में जल की उपयोगिता को रेखांकित करती है और हमें सचेत करती है कि जिस दिन जल स्रोतों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, उस दिन पृथ्वी पर जीवन समाप्त हो जायेगा | नदियाँ मानव सभ्यता के विकास की स...

हिन्दी पत्रकारिता : संभावनाएं एवं चुनौतियाँ

पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़ी तेजी से बदलाव देखने को मिले हैं | कुछ बदलाव जहाँ सकारात्मक प्रतीत होते हैं वहीं कुछ बदलाव २०० वर्ष पूरे करने की ओर अग्रसर हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष कठिन चुनौती प्रस्तुत  करते नज़र आते हैं | प्रसार संख्या की दृष्टि से अंग्रेजी समाचार पत्रों से काफी आगे निकल चुके हिन्दी समाचार पत्र इसके समृद्ध संसार को दर्शाते हैं तो वहीं हिन्दी समाचार चैनल तेजी से बाजार विस्तार कर रहे हैं | अच्छी यातायात व्यवस्था, साक्षरता दर में सुधार, एवं उन्नत तकनीकी ने समाचार पत्रों को ग्रामीण बाज़ार की तरफ अग्रसर करने का कार्य किया है | साथ टी वी चैनल बड़ी तेजी से क्षेत्र विस्तार करने में लगे हैं जिससे सुदूरवर्ती क्षेत्रों एवं ग्रामीण अंचलों में भी सिर्फ दूरदर्शन सेवा प्राप्त करने की बाध्यता  समाप्त हो गई है | आज हिन्दी पत्रकारिता, अंग्रेजी एवं अन्य भाषायी पत्रकारिता से कोसों आगे नज़र आती है जिन्हें आई आर एस की रिपोर्ट पुष्ट करती है | टेलीविजन रेटिंग पॉइंट में भी हिन्दी समाचार चैनलों को आगे देखा जा सकता है | हिन्दी पत्रकारिता के बाजार विस्तार के पीछे ह...

प्लास्टिक कचरे का बढ़ता बोझ

पर्यावरण के समक्ष उपस्थित वर्तमान चुनौतियों में प्लास्टिक जनित चुनौती सर्व-प्रमुख है | प्लास्टिक किसी न किसी रूप में हमारे दैनिक गतिविधियों में इस प्रकार से सम्मिलित हो चुका है कि तमाम प्रयत्न के बावजूद हम अपने जीवन से इसे निकाल नहीं पा रहे हैं | एक तरफ सरकार द्वारा ‘प्लास्टिक मुक्त भारत की’ कोशिशें की जा रही हैं वहीं दूसरी तरफ प्लास्टिक कचरे का लग रहा अम्बार भविष्य में एक गम्भीर परिणाम की तरफ इशारा कर रहा है | आज सिंगल यूज़ प्लास्टिक के प्रयोग को रोकना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है | केंद्र एवं राज्य स्तर पर प्लास्टिक का उपयोग रोकने के लिए कई कानून भी लागू हैं परन्तु इनका प्रभावी असर देखने को नहीं मिलता है | सरकार द्वारा निर्देश जारी होने के बाद भले ही कुछ दिनों तक लोग प्लास्टिक के उपयोग से बचते हैं परन्तु कुछ दिनों के बाद ही सब सामान्य हो जाता है | सरकारी मशीनरी की सक्रियता कम होती जाती है एवं प्लास्टिक उत्पाद निर्माता कम्पनियों के हौसले बुलन्द होते जाते हैं | दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति एवं इण्डियन पाल्यूशन कंट्रोल एसोसिएशन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार सालाना भारत में ३४ लाख टन प्...

अमर शहीदों के शौर्य और बलिदान की दस्तावेज प्रस्तुत करती फ़िल्में

23 मार्च, 1931 भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में वह तिथि है जो आज भी हमें आज़ादी का मूल्य समझाती है, साथ ही हँसते-हँसते फांसी के फंदे को गले लगा लेने वाले अमर बलिदानियों के त्याग और बलिदान की याद दिलाती है | यह तिथि हमें भारत माँ को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने वाले उन वीर शहीदों की याद दिलाती है जो भारतीय स्वतंत्रता की पटकथा लिखते हुए सदा के लिए खामोश हो गये | भारतीय स्वतंत्रता के नायकों की जब भी बात होगी, अमर शहीद भगत सिंह की जरुर बात होगी | शहीद भगत सिंह का व्यक्तित्व न सिर्फ भारतीय जनमानस में क्रांति का ‘इंकलाब’ पैदा करता है अपितु फिल्मकारों को भी खींचता है | आजादी के लगभग 75 वर्ष बाद भी स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि को केंद्र में रखकर फ़िल्में बन रही हैं जिनमें भारतीय स्वतंत्रता की पटकथा लिखने वाले नायकों के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं को रेखांकित किया जाता है | यह विषय आजादी के लगभग 75 वर्ष पूरा होने के बावजूद न सिर्फ फिल्म निर्माताओं को अपनी तरफ खींचता है अपितु भारतीय जनमानस में आज़ादी के संघर्षों से जुड़ी मुख्य घटनाओं सम्बन्धित संचार भी करता है | बड़े पर्दे पर ‘शही...

सूरजकुण्ड मेला : नये सन्दर्भों में परम्परा का ताना- बाना

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देश के प्रमुख लक्खी मेलों में शुमार ‘सूरजकुण्ड अन्तर्राष्ट्रीय क्राफ्ट मेला’ एक आधुनिक लोक सम्मेलन है । दिल्ली से सटे हरियाणा के शहर फरीदाबाद को सूरजकुण्ड मेले के आयोजन के लिए भी विशेषतौर पर जाना जाता है । इस मेले में न सिर्फ परम्परागत कलाओं की जीवन्त झाँकी देखने को मिलती है बल्कि कई मायनों में इस मेले से आधुनिकता की भीनी- भीनी खुश्बू भी आती है, ऐसा लगता है जैसे मेले में गाँव और शहर दोनों के रंग मिलाकर किसी ने चित्रकारी की हो । मेले का नैसर्गिक स्वरूप हो या फिर आधुनिकता का तड़का, ४० एकड़ में फैले मेला परिसर में दोनों का बोध होता है । एक तरफ जहाँ यह मेला ग्रामीण कलाकारों को मंच प्रदान करता है वहीं दूसरी तरफ शहरी लोगों के रूप में आधुनिकता से ओत- प्रोत दर्शक भी । प्रतिवर्ष लाखों आगन्तुकों को अपनी तरफ खींचकर ले आने वाले इस मेले में विदेशी सैलानियों की संख्या भी हजारों में होती है । सार्क देशों के अलावा अन्य पड़ोसी देशों की सहभागिता इस मेले को न सिर्फ अन्तर्राष्ट्रीय दर्जा प्रदान करती है अपितु यह विश्व का सबसे बड़ा क्राफ्ट मेले का दर्जा भी हासिल कर चुका है । सूरजकुण्ड मेला प्राधिकरण हरियाणा एवं...

हमने देखा है

  हमने देखा है यू पी को  बदलते  हुए, आगे बढ़ते हुए इसको  संवरते   हुए | छूट गया था राह में जो पीछे कभी, तेज चलते हुए इसको निखरते हुए || हमने देखा है ……. राम की अयोध्या भी खुशहाल है, मेरी काशी का भी बदला हाल है | सुनाई देने लगी मंदिरों की घंटियाँ, ध्वज सनातन का फिर फहरते हुए || हमने देखा है …… नफरतों ने जलाये थे जो घर कभी, फिर से बनते हुए उसे संवरते हुए | कबीर लड़ते रहे थे उम्र भर जिससे, जमी बर्फ को दिलों से पिघलते हुए || हमने देखा है … चल पड़ा है जो मंजिल की ओर, देख सकते नहीं अब ठहरते हुए   | चारों दिशाओं में फैलेगी खुश्बू , हवाएं भी कहेंगी ये गुजरते हुए   || हमने देखा है … चंद कदम चले हैं चलते ही जाना है, सपनों को ‘दीप’ सच कर दिखाना है | बंजर सी जमीं में फुंट रहे हैं अंकुर, देखना है इसमें फूल निकलते हुए || हमने देखा है …