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मात्र भौगोलिक इकाई नहीं हैं नदियां

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  नदियों का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है | भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता नदियों के किनारे पुष्पित पल्लवित हुई हैं | हमारे वेद-पुराण नदियों की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं जबकि धार्मिक अनुष्ठानों के लिए नदी तट को अत्यन्त शुभ बताते हैं | भारतीय सभ्यता के विकास की साक्षी नदियाँ, भारतीय ऋषियों के तप की भी साक्षी रही हैं | नदियों का हमारे सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है | नदियाँ हमारे लिए मात्र भौगोलिक इकाई नहीं हैं अपितु सृष्टि के सृजन एवं संचालन दोनों में ही नदियों की महती भूमिका परिलक्षित होती है | नदियाँ मात्र जल-स्रोत नहीं है, यह समग्र में एक पारिस्थितकीय तंत्र भी है जिसमें अनेकों जलचर निवास करते हैं | प्राचीन काल से ही नदियाँ भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में भी सहभागी रही हैं | परन्तु विगत कुछ वर्षों से नदियों के मुक्त-प्रवाह के साथ ही इनके जल की गुणवत्ता में नकारात्मक बदलाव देखने को मिला है | नदियों को ‘माँ’ कहकर पूजने वाले भारत में नदियों की दयनीय स्थिति भविष्य के लिए सुखद सन्देश नहीं हैं | ऐतिहासिक महत्त्व वाली अनेक नदियों का ‘नाले’ में परिवर्...

हम कट्टर ईमानदार हैं

हम कट्टर ईमानदार हैं हम कट्टर ईमानदार जबसे सत्ता में आये हैं हम, कई रंग दिखाये हैं | जब चाहा पलटी मारी, नये रिकॉर्ड बनाये हैं || लोभ द्वेष पाखण्ड से हम, करते बहुत प्यार हैं | डंके की चोट पर हम, करते नित् भ्रष्टाचार हैं || हम कट्टर ईमानदार हैं.............. लोक लुभावन बातें हैं, रायता हम फैलाते हैं | अपनी ही बातों से हम, साफ़ मुकर जाते हैं   || बड़े-बड़ों से प्रश्न हैं पूछे, सत्ता के हम हैं भूखे | पूछे जाते प्रश्न कभी, बना लेते उसे हथियार हैं || हम कट्टर ईमानदार हैं.............. सत्ता हथियाने को हमने, किये हजारों वादे झूठे | दोस्त यार सब पीछे छूटे, गुरु जी रूठे तो रूठे || कंगाल हुआ राज्य भले, विज्ञापनों की भरमार है | जन-भावनाएं रोज बेंचते, हम करते व्यापार हैं || हम कट्टर ईमानदार...  

भारतीय दिलों में अमर हैं नेताजी

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आज हम आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, एवं सरकार द्वारा स्वतंत्र भारत की यज्ञ-वेदी में आहुति देने वाले नायकों के योगदान-गाथा को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है | ऐसे में भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के महान नायक ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ की कहानी आज़ादी के ७५ वर्ष बाद भी हमें भारतीय स्वतंत्रता की कीमत समझाने में सफल दिखती है जिसने भारतीय क्रांति की अमर गाथा को अपने लहू से लिखने का कार्य किया था | भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने न सिर्फ एक नई दिशा दी अपितु स्वतंत्र भारत की पटकथा लिखने में अग्रणी भूमिका निभाने का कार्य किया | उच्च प्रशासनिक पद को ठोकर मारकर अपनी मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले नेताजी से जुड़े अनेक तथ्यों से भारतीय जनमानस भले ही अनजान है परन्तु नेताजी द्वारा किये गये साहसिक कार्य भारतीय इतिहास की पुस्तकों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है | तत्कालीन इतिहासकार भले ही नेताजी से जुड़े तथ्यों के साथ न्याय नहीं कर सके, परन्तु वर्तमान सरकार द्वारा नेताजी के कार्यों को भारतीय जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करने के प्रयास ने अपने वीर नायक से जुड़ने का अवस...

बारिश की बूँदों को सहेजना जरुरी

  भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जिसकी दिशा एवं दशा दोनों ही मानसून तय करता है | अपेक्षानुरूप बारिश, न सिर्फ कृषि उत्पादन तय करती है अपितु यह भारत की अर्थव्यवस्था पर भी असर डालती है | हमारे यहाँ फसल उत्पादन का तरीका भी मौसम सापेक्ष ही रहा है अर्थात कौन सी फसल कौन से मौसम में उगानी है ? का निर्धारण भी मौसम के अनुसार ही किया गया है | धान जो कि एक मुख्य फसल है, एवं इसका उत्पादन अधिक जल आपूर्ति की माँग करता है, और इस आपूर्ति को कहीं न कहीं बारिश ही पूरी करती है | जलवायु परिवर्तन के कारण विगत कुछ वर्षों में वर्षा-चक्र में बदलाव भी देखने को मिला है जिसकी वजह से मानसून आने में देरी जैसी समस्या का सामना करना पड़ा है | समय से मानसून नहीं आने की वजह से जून-जुलाई के महीने में धान की रोपाई करने को तैयार भारतीय किसान मायूस होता है, साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था भी मायूस होती है क्योंकि इसका असर वार्षिक कृषि-चक्र पर भी पड़ता है | भारत में औसत बारिश होने के बावजूद भी कई राज्य सूखे का दंश झेलने को मजबूर दिखलाई देते हैं तो कुछ राज्य बाढ़ की विभीषिका झेलते हैं | मानसून...

जनसंख्या की रफ़्तार थमे, तो बात बने

  भारत एक विकासशील देश है, एवं विकसित राष्ट्र के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयासरत है परन्तु तेजी से बढ़ रही जनसंख्या भारत के इस लक्ष्य को निरन्तर दूर करते हुए दिखलाई देती है | हमारा देश जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में दूसरे स्थान पर है, और पिछले कुछ वर्षों में जनसँख्या बृद्धि की जो दर रही है, जल्द ही सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश चीन को पीछे छोड़ देने की सम्भावना है | वर्तमान समय में देश के समक्ष उपस्थित अनेकों चुनौतियों के पीछे हम किसी न किसी रूप में जनसंख्या बृद्धि को कारक के रूप में देख सकते हैं | संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना हो अथवा रोटी, कपड़ा एवं मकान की व्यवस्था करनी हो, सुरसा की तरह मुँह फैलाती जनसंख्या के समक्ष यह ऊँट के मुँह में जीरा प्रतीत होता है | बढ़ती जनसंख्या न सिर्फ भारतीय अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचा रही है अपितु सरकार द्वारा रोजगार प्रदान करने की राह में प्रमुख रोड़े के रूप में भी दिख रही है | उदाहरण स्वरुप सरकार जब तक १ करोड़ रोजगार सृजित करती है, जनसंख्या दोगुनी अथवा चौगुनी बढ़ जाती है, इससे समस्या निरन्तर बढ़ती ही जा रही है | तेजी से बढ़ रही जनसंख्या कई...

मानसिक प्रदूषण फैलाते टीवी डिबेट

  विगत कुछ वर्षों से समाचार चैनलों पर समसामयिक विषय पर ‘बहस’ को अनिवार्य रूप से दिखाया जा रहा है | भले ही इस चर्चा-परिचर्चा के पीछे चैनल का आर्थिक गणित छुपा हुआ है परन्तु देखा जाय तो ‘टीवी डिबेट’ ने देश के सामाजिक गणित को सबसे अधिक प्रभावित किया है | किसी भी लोकतान्त्रिक देश में किसी विषय पर चर्चा करना, स्वस्थ लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करता है परन्तु जिस प्रकार से समाचार चैनलों पर चर्चा होती है, निश्चित रूप से यह मानसिक प्रदूषण को फ़ैलाने का कार्य करता है | इन चर्चाओं के पीछे न सिर्फ समाचार चैनल का एक ‘एजेंडा’ छिपा हुआ दिखलाई देता है अपितु कई बार यह चर्चा किसी प्रमुख मुद्दे से ध्यान भटकाने का कार्य करती है | हास्यास्पद तब होता है जब एक ही विशेषज्ञ विभिन्न विषय पर चर्चा करता हुआ नजर आता है, ऐसे में विषय की गम्भीरता प्रभावित होना स्वाभाविक है | कभी-कभी तो न्यूज़ एंकर पक्ष या विपक्ष की तरफ से बोलता हुआ नजर आता है जिससे समाचार चैनल की वस्तुनिष्ठता प्रभावित   होती है | किसी भी विषय पर चर्चा करते समय, चर्चा को राजनीतिक रंग देना आज सामान्य बात है परन्तु इससे न तो विषय के साथ न्याय होता...

जल स्रोतों को बचाना जरुरी

पिछले कुछ वर्षों में देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों में पेय जल का संकट देखने को मिला है वहीं ग्रामीण क्षेत्र भी सूखते जलस्रोतों को देखने को विवश दिखे हैं | एक तरफ गंगा, यमुना, कावेरी, एवं नर्मदा जैसी बड़ी नदियों का स्वतन्त्र जल प्रवाह अवरूद्ध होता दिखा है वहीं वर्षों से ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहे कुएं एवं नलकूप का जल स्तर भी बेहद नीचे पहुँच चुका है | ताल, तलैया जहाँ बीते दिनों की बात हैं वहीं देश की प्रमुख झील सूखे का दंश झेलने को विवश हैं | तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद छोटे तालाब एवं पोखर भी दयनीय स्थिति में ही दिखते हैं | जल स्रोतों के रूप में उपलब्ध लगभग सभी विकल्प आज गम्भीर संकट का सामना कर रहे हैं | सरकारी तंत्र की अनदेखी एवं आम जनमानस की उपेक्षा से भले ही जल स्रोत संकट ग्रस्त दिखते हैं परन्तु वास्तविकता यह है कि इससे पूरा जीवन तंत्र ही खतरे में है | जल ही जीवन है, सदियों पुरानी यह उक्ति हमारे जीवन में जल की उपयोगिता को रेखांकित करती है और हमें सचेत करती है कि जिस दिन जल स्रोतों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, उस दिन पृथ्वी पर जीवन समाप्त हो जायेगा | नदियाँ मानव सभ्यता के विकास की स...