संदेश

महंगाई के मारे, नेताजी बेचारे ( व्यंग्य )

महंगाई की मार से आज न सिर्फ आम जनता परेशान है बल्कि देश के नेताओं के सामने भी रोटी – दाल का संकट आ खड़ा हुआ है । कई नेता तो शपथ ग्रहण के तुरन्त बाद से ही परेशान हैं कि इस महंगाई डायन से कैसे निपटें । कुछ एक   नेता जी तो यह सोच – सोच कर ब्लडप्रेशर के मरीज हो चुके हैं । इसी वजह से प्रधानमंत्री महोदय आजकल बहुत चिंतित नज़र आते हैं । पिछले कुछ सालों में उन्होंने सार्वजनिक मंचों से कई बार इस बात को दोहराया है कि गरीबों का दर्द वो भली – भांति समझ सकते हैं । ये अलग बात है कि इस दौरान न गरीबों का दर्द कम हुआ है और न ही गरीबी । प्रधानमंत्री जी नोटबंदी से लेकर तमाम उपाय कर चुके हैं । वे तो पैसों का पेड़ भी लगाने को तैयार थे परन्तु पूर्व प्रधानमंत्री का मानना था कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं । इसलिए इन्होंने पैसों के पेड़ वाला आईडिया ड्रॉप कर दिया । अब आप ही बताइये वो पूर्व प्रधानमंत्री की तौहीन कैसे करते ? और तो और उनके बात में दम भी था क्योंकि अगर पैसे पेड़ पर उगते तो उनके मंत्रियों को घोटाले करने की जरुरत ही नहीं पड़ती। बेचारे नेताजी पांच साल में झूठ बेईमानी और भ्रष्टाचार के बल प...

हिन्दी

अपने ही देश में हिन्दी, सिसक- २ कर रोती है । अंग्रेजी सोये डनलप पर, हिन्दी खाट पर सोती है ।। निज भाषा उन्नति अहै, भारतेन्दु जी कहते थे । दिल में बसाकर हिन्दी, इसीकी दुनिया में रहते थे ।। केवल भाषा नहीं थी हिन्दी, भारतीयों का मान थी । निज गौरव की अनुभूति, करोड़ों का अभिमान थी ।। ब्रज, अवधी और मैथिली, भोजपुरी को भाती थी । संस्कृत बोलने वालों को, अपनी ओर लुभाती थी ।। हिन्दी संस्कार की भाषा है, खुश्बू इससे आती है । राष्ट्रभाषा के रूप में, राष्ट्रप्रेम दिल में जगाती है ।। अंग्रेजी की चकाचौंध में, हिन्दी से हम दूर हुए । मातृभाषा भी अपनी, बिसराने को मजबूर हुए ।। अंग्रेजीयत की चाह में, मन आज गुलाम हुआ । सोच पराई हो गई, विचार भी गुमनाम हुआ ।। सोचो ऐ हिन्द सपूतों, इसका न तिरस्कार करो । माँ रुपी हिन्दी से, गैरों सा न व्यवहार करो ।।

वो गाँव कहाँ है ?

पथिक भी पाता था ढेरों प्यार जहाँ, झोपड़ी में प्यार समेटे गाँव कहाँ है । बनने लगे पक्के मकान जबसे ‘दीप, ‘अतिथि देवो भवः’ का भाव कहाँ है ।। कट गया जबसे आँगन घर के नक़्शे से, साथ भोजन की परम्परा कहाँ है । बाँट लेते थे दुःख-दर्द चौपाल में, चौपाल लगे जहाँ वो पीपल छाँव कहाँ है ।। दिखती नहीं है गौरैया घर-आँगन में, हर कोई खोया है अजीब उलझन में । कट गया है जबसे वो बुढा बरगद, कोयल की कूक कौवे की कांव कहाँ है ।। दिखते नहीं आंसू पड़ोसी की आँखों में, गैरों के दर्द की अब परवाह कहाँ है । जवां हो जाते बच्चे तकनीक के गोद में, बच्चों का बच्चों से लगाव कहाँ है ।।

चुनाव नजदीक है

कल गाँव से भैया का फ़ोन आया था । बता रहे थे कि ३ साल पहले जो पुलिया टूट गयी थी और जिसकी वजह से सैकड़ों गाँव के लोगों को शहर जाने के लिए कई किलोमीटर ज्यादा चलना पड़ता था , उसके मरम्मत का काम शुरू हो गया है । सांसद निधि से सांसद महोदय ने पुरे २२ लाख रूपये दिए हैं और साथ ही पी डब्ल्यू डी के अभियन्ता को निर्देश भी कि जल्द से जल्द पुलिया के मरम्मत का काम पूरा कर उन्हें रिपोर्ट भेजा जाय । माननीय ने सभी आला अधिकारियों को लताड़ भी लगाई । उन्होंने कहा कि मेरे क्षेत्र की जनता को किसी भी तरह की तकलीफ हो , कत्तई बर्दाश्त नहीं किया जायेगा । मैंने भैया से पूछा कि क्या सांसद जी को पुलिया टूटने की ख़बर नहीं थी ? पिछले ३ साल में वो कभी गाँव के तरफ नहीं गये ? क्या उनके शुभचिंतकों ने उन्हें गाँव वालों की परेशानियों से अवगत नहीं कराया ? इतने सारे प्रश्न सुनकर भैया ने बात को टालते हुए कहा कि माननीय के पास क्षेत्र के अलावा सैकड़ों काम हैं , रही बात इस तरफ आने कि तो मंत्री बनने के बाद विधानसभा चुनाव के दौरान हेलीकॉप्टर से   प्रचार करने आये थे , ऐसे में इतनी छोटी समस्या पर उनका ध्यान ही नहीं गया होगा या फ...

अंगूर खट्टे हैं

             कल मेरे एक छात्र ने मुझसे पूछा कि अंगूर का स्वाद कैसा होता है ? मुझे उसका प्रश्न कुछ अटपटा लगा परन्तु बात एक होनहार छात्र की थी अतः उससे बिना सिर पैर के प्रश्न की उम्मीद भी नहीं थी । मै आश्वस्त था कि यह होनहार छात्र जरुर   किसी गम्भीर प्रश्न को हल करना चाहता होगा तभी तो ऐसे जटील प्रश्न से मेरी परीक्षा ले रहा । वैसे तो मुझे सटीक उत्तर नहीं मालूम था परन्तु अध्यापक होने के नाते उत्तर देना भी आवश्यक था । ऐसे में मैंने भी वही किया जो अधिसंख्य अध्यापक करते हैं । प्रश्न को छात्रों के पाले में डाल दिया । कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा । कुछ छात्र डर के मारे कुछ नहीं बोल रहे थे तो कुछ को शायद प्रश्न समझ में नहीं आया था । कुछ देर के सन्नाटे के बाद दीपक नाम के एक छात्र ने उत्तर दिया, सर अंगूर तो खट्टे भी होते हैं और मीठे भी । बचपन में सुना था कि अंगूर मिल जाएँ तो खट्टे और नहीं मिले तो मीठे होते हैं । कुछ अंगूर हमेशा खट्टे होते हैं और कुछ हमेशा मीठे, वहीं कुछ मौसमानुकूल अपना स्वाद बदल लेते हैं । कुछ अंगूर का एक विशेष...

तेरा ख़त

जब भी उदास होता हूँ , झंझावातों में उलझकर  होठों पर हल्की मुस्कान, बिखेर जाता है तेरा ख़त  जब भी मायूस होता हूँ, असफलताओं के बाद  रौशनी की किरण दिल में जगा जाते हैं वो शब्द  तन्हाईयों के बिस्तर पर जब नींद आती नहीं है  लोरी बनकर मुझे सुला जाते हैं वो लिखे अक्षर  डगमगाते हैं जब भी पाँव ज़िन्दगी के डगर पर  आँखों से कानों तक पहुँच हौसला दे जाते स्वर  न होकर भी पास होते हो हर कदम साथ तुम  कैसी ये ज़िन्दगी होती, न होते पास जो तेरे ख़त 

जो फिट है वो हिट है

                                                        कहते हैं कि जो फिट है वही हिट है । यह कहावत जिन्दगी के हर क्षेत्र में सौ फीसदी सच साबित होती है । बात चाहे परिवार की हो या समाज की या फिर बात कल या आज की हो, फिट व्यक्ति ही हर जगह हिट रहता है । आखिर डार्विन सर ने भी तो कहा था कि इस धरती पर वही व्यक्ति टिका रह सकता है जो इसके वातावरण के लिए फिट हो । समय बदला परन्तु डार्विन सर का यह सिद्धान्त नहीं बदला । सालों बीत जाने के बाद भी यह सिद्धान्त बहुतों के लिए आदर्श सिद्धान्त है । और बात अगर राजनीतिक पिच की हो तो फिटनेस की महत्ता और भी बढ़ जाती है । हाँ यहाँ फिटनेस की परिभाषा थोड़ी अलग है । यहाँ शारीरिक और मानसिक फिटनेस के बजाय राजनीतिक फिटनेस की जरुरत होती है । अब आप कहेंगे कि राजनीतिक फिटनेस किस बला का नाम है ? कुछ मित्रो...