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ज़िन्दगी के फ़लसफ़ें

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  रेत की बुनियाद पर घर बनाते नहीं | ख़ुश्क जमीं पे शज़र हम लगाते नहीं || ख्वाब देखना कोई बुरी बात नहीं है   | ख्वाबों के संग ज़िन्दगी बिताते नहीं   || नफरतें मिटा देती हैं मुस्कान हमारी   | मुस्कुराहटों को हम तो भूलाते नहीं   || सर्द रात भी कट जायेगी धीरे-धीरे | किसी का घर तो हम जलाते नहीं || दफ्न होंगे सीने में बहुत राज हमारे | हर शख्स को राज अपने बताते नहीं || खामोशियाँ भी कह जाती हैं बात कई | दर्द दिल के लवों पे हम लाते नहीं || तूफ़ान के संग दीप जला लेंगे हम | हवा के रूख से हम तो घबड़ाते नहीं ||  

न्यायिक सुधारों की धीमी रफ़्तार से न्याय-व्यवस्था बीमार

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  किसी भी देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को जिंदा रखने में उस देश की न्यायपालिका महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है | न्यायपालिका का सुदृढ़ होना न सिर्फ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है अपितु देश को किसी भी अराजक स्थिति से बचाने में यह रक्षा कवच के रूप में कार्य करती है | सशक्त से अशक्त को न्याय दिलाने वाली न्यायपालिका का स्थान लोकतंत्र में काफी ऊँचा है, परन्तु न्याय की उम्मीद लिये आम जनमानस की इस अंतिम शरणस्थली में मिलने वाली प्रत्येक अगली तारीख पीड़ित की वेदना को बढ़ाने का कार्य करती है, और समय बीतने के साथ यह वेदना पीड़ित के न्यायपालिका में विश्वास का ह्रास करती जाती है | न्याय मिलने की धीमी प्रक्रिया से न सिर्फ पीड़ित व्यक्ति का मनोबल टूटता है अपितु वह आर्थिक, मानसिक एवं शारीरिक रूप से भी कमजोर होता जाता है | तारीख पर तारीख झेलने वाले अनगिनत मुकदमों में फैसला तब आता है जब उस फैसले का कोई औचित्य नहीं रह जाता है क्योंकि इस दौरान पीड़ित व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक, एवं शारीरिक दुर्दशा की उस पीड़ा को झेलने को विवश होता है जो न्याय मिलने के बाद भी समाप्त नहीं होती है | न्याय के लिए साक्ष्य आवश्यक है, साक्ष्य क...

आज फिर

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चलो आज फिर पुरानी बात करते हैं  | धूल में लिपटी किताबें साफ करते हैं  || कुछ पन्नों को पलटते हैं आज फिर  | अपने अतीत से  मुलाकात करते हैं  || बहा लेते हैं आज अश्कों के समंदर  | छुपा रखे हैं जिन्हें पलकों के अंदर  || गिले शिकवे मिटा लग जाते हैं गले  | साथ चले हुए कदम याद करते हैं   || मिटा देते हैं ज़ख्मों के निशान सभी  | वक्त ने लगाया था जो दिल पे कभी  || बसाते हैं फिर से सपनों का आशियाँ | रौशन मिलकर उसे साथ करते हैं  || छोड़ देते हैं हम तन्हाईयों के साथ को | भूला देते हैं रुसवाईयों की हर बात को || मिलकर सँजोते हैं कुछ नये ख्वाब हम | रंग भरते हैं खुशियों के साथ साथ हम || चाँद को छूने निकलते हैं आज 'दीप' | सफर जिंदगी का हम साथ करते हैं ||

समावेशी बजट से विकसित भारत के लक्ष्य को साधने का प्रयास

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  विगत कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है जिससे यह उम्मीद जगी है कि आगामी कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व के तीन अग्रणी देशों में स्थान बना लेगी | मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में प्रस्तुत पूर्ण बजट भी आर्थिक सुधारों की पटकथा लिखने का प्रयास है जिसमें मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के साथ ही कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव का ताना-बाना बुनने का प्रयास किया गया है | इस बजट में एक तरफ तो तकनीकी, कौशल, एवं नवाचारों से जुड़ी कई योजनाओं को सम्मिलित किया गया है तो वहीं सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं को भी महत्त्व दिया गया है | बजट में मध्यमवर्गीय करदाताओं को राहत देकर सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले इस वर्ग को महंगाई के इस दौर में राहत आवश्यक है, और यह तभी संभव है जब मध्यम वर्ग आर्थिक रूप से मजबूत हो | वर्तमान महंगाई दर का दंश झेलने वाले मध्यमवर्ग के चेहरे पर मुस्कान लाकर सरकार ने आगामी चुनावों में भी बढ़त हासिल करने की ओर कदम बढ़ा दिया है क्योंकि इस बजट ने मध्यम वर्ग को संजीवनी देने का कार्य किया है | भारतीय...

शैक्षणिक उन्नयन की ओर बढ़ते भारतीय कदम

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  विगत कुछ वर्षों में भारत सरकार ने शिक्षा प्रणाली में कई बदलाव किये हैं जिसका मूल उद्देश्य भारतीय शिक्षा पद्धति को भारतीय मूल्यों से पोषित एवं रोजगारोन्मुखी बनाना है जिससे उपलब्ध मानव संसाधन को वैश्विक अवसरों के योग्य बनाया जा सके | विशेष रूप से, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जो बदलाव किये जा रहे हैं उनके दूरगामी परिणाम प्राप्त हो सकते हैं बशर्ते उच्च शिक्षण संस्थानों का वातावरण शैक्षणिक बदलावों के अनुकूल हो | राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 ने एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त किया है जिसमें भारत को ज्ञान के केंद्र के रूप में पुनःस्थापित करने के साथ ही जीवंत समाज निर्माण के आधारतत्व निहित हैं | इससे भारतीय शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प होने की उम्मीद जगी है तो वहीं मैकाले पद्धति की शिक्षा व्यवस्था को पीछे छोड़कर भारतीय समाज के अनुकूल एक नई शिक्षा व्यवस्था निर्मित करने का प्रयास दिखलाई देता है | यह शिक्षा पद्धति, भारतीय भाषा में शिक्षा प्रदान करने की ओर कदम बढ़ाने के साथ ही कौशलयुक्त शिक्षा पर भी जोर देती है जिससे शिक्षा के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्ष दोनों का लाभ शिक्षार्थी को मिल...

स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक है कुटुंब प्रबोधन

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  विगत दिनों काशी के एक बृद्धाश्रम में ख्यातिलब्ध लेखक एस एन खंडेलवाल की मृत्यु हो गई, जिनके अंतिम संस्कार में उनके बच्चों ने आने से मना कर दिया | करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक रहे खंडेलवाल की बृद्धाश्रम तक की यात्रा, एवं बेटे के रहते हुए मृत्यु पश्चात् सामाजिक कार्यकर्ता अमन कबीर द्वारा मुखाग्नि देना, भारतीय मूल्यों पर पड़ने वाली वह चोट है जो न सिर्फ हमारी सामाजिक मान्यताओं को दरका रहा है अपितु कुटुंब प्रबोधन की आवश्यकता को भी रेखांकित कर रहा है | परिवार में संवाद की प्रक्रिया ही परिवार को जोड़ने का कार्य करती है | जैसे ही यह प्रक्रिया बाधित होती है, परिवार की एकता कमजोर होने लगती है, और अंततः परिवार नामक संस्था प्राणविहीन सी हो जाती है | शहरीकरण ने पहले ही परिवार नामक संस्था को एकल स्वरुप देकर कमजोर करने का प्रयास किया है जिससे हमारे देश में संयुक्त परिवारों की संख्या निरंतर घटी है | संयुक्त परिवार की संकल्पना भारतीय समाज की सहगामी रही है, एवं एकत्व के सूत्र की संवाहक भी | संयुक्त परिवार सदियों से भारतीय समाज को एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य करता रहा है | परन्तु विगत कुछ वर्षों स...