संदेश

पर्यावरण दिवस

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आज गमलों में पौधे लगाने लगे हैं | वो पर्यावरण दिवस मनाने लगे हैं || पोखर को पाटकर बनाया मकान | आज पानी की बूँदें बचाने लगे हैं || नदियों में घोला था ज़हर धीरे-धीरे | पानी की किल्लत से घबराने लगे हैं || दम घुट रही है इस आबो- हवा में | ऐसी बातें सभी को बताने लगे हैं || जरा सी तपिश में हो जाते बेहाल | मौसम की बेरुखी वो सुनाने लगे हैं || दंभ था जिन्हें आधुनिक ज्ञान का | वो वेदों के संग वक्त बिताने लगे हैं ||

वो और उनकी यादें

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  उनकी याद आयी तो   मुस्कुरा बैठे | रोका बहुत मगर अश्कों से नहा बैठे || आज उन्होंने भी याद किया होगा मुझे | इस एहसास में अपना  दर्द भूला बैठे || ये मिलना बिछड़ना मुकद्दर का खेल था | जमीं और आसमां का कहाँ कोई मेल था || दिल को समझाया यूँ तो बहुत ही मगर | गली से उनके गुजरे तो होश गंवा बैठे || ख्वाब में आ जाते थे मिलने हमदम मेरे | सामने आये तो मुझसे नज़रें चुरा बैठे || हिज्र-ए-शाम में देखा था दूर जाते उन्हें | मुद्दतों बाद मिले तो अजनबी बता बैठे || दिल ने चाहा रोक ले उन्हें दूर जाने से | वो अपने आरजू-ए-सफ़र पर जा बैठे || जिंदा है अक्स उनका मेरे वजूद में 'दीप' | मेरी परछाइयों से दूर जो घर बना बैठे ||

चलो फिर

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  चलो इस तन्हाई का रहबर ढूंढते हैं | खो आये मुस्कान जहाँ शहर ढूंढते हैं || चले थे जहाँ से एक बार जाते हैं फिर | यादों के कारवां समेटे डगर ढूंढते हैं || अंधेरों के गर्दिश ने भटकाया बहुत | उजालों से भरी एक सहर ढूंढते हैं | | उतार फेंकते हैं अमीरी के लिबास | जेहन में समाया पुराना घर ढूंढते हैं || वो कागज की कश्ती बनाते हैं फिर | वजह-बेवजह हम मुस्कुराते हैं फिर || वो लड़ना झगड़ना फिर मिल जाना | भावनाओं का ऐसा समन्दर ढूंढते हैं || खुशियों की बारिश में नहाते हैं ‘दीप’ | रूठा हुआ अपना मुकद्दर   ढूंढते हैं ||

आओ मतदान करें

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आओ मिल मतदान करें | राष्ट्रहित में योगदान करें || लोकतंत्र के  महापर्व का | दिल से हम सम्मान करें  || पाँच वर्ष में आया अवसर | व्यर्थ न कर देना  इसको || अपने मत की कीमत समझो | दे आना तुम मर्जी जिसको || एक बार जो तुम चूक गये | मत दिया नहीं घर रूक गये || कोई अपात्र पा गया जो कुर्सी | तुम अपनी नज़रों में झुक गये || राष्ट्र निर्माण की बेला है यह | समझो इसकी महत्ता भाई || संविधान ने दिया है शक्ति | करती यह सत्ता की तुरपाई || उठो घरों से निकलो तुम | अपना मत न व्यर्थ करो || एक वोट की ताकत समझो | राष्ट्र को तुम समर्थ करो ||

ज़ज्बात

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आज फ़िर एक खत जलाया है हमने | आज फ़िर खुद को रुलाया है हमने || उनकी यादों के मोती रखे थे जो लिखे |  अश्कों संग अक्षर वो  बहाया है हमने || दामन में उजाले की खायी थी कसम | आज अंधेरे को गले लगाया है हमने || जिन यादों से लवों पर थी मेरे हँसी | आज यादों पे पहरा बिठाया है हमने || ज़ख़्म जो बन गये थे बर्फ़ रफ्ता-रफ्ता | कुरेदकर उन्हें फिर पिघलाया है हमने || मुलाकातों के समंदर में मिली थी कभी | उनकी यादें बमुश्किल भुलाया है हमने || वक्त ने बना दिया तेज़ाब जिस रिश्ते को | उस रिश्ते को अब तक निभाया है हमने ||

अपना मुकद्दर

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दम तोड़ देती हैं, कई नदियाँ सफ़र में | हर नदी को नसीब, समुंदर नहीं होता || बनाते हैं मजदूर जो, दूसरों के महल | उन दिहाड़ियों का खुद, घर नहीं होता || दर्द को लगाते हैं, हँसकर गले कुछ | हर दर्द जमाने का, ज़हर नहीं होता || देखा है खुश्क शज़र, दरिया के पास | हर दरख़्त हरा हो, मुकद्दर नहीं होता || महरूम रह जाते हैं, प्यार की दो बूँद से | हर शख्स को,अमृत मयस्सर नहीं होता || गाँव से देखा है, रोज शहर जाते कई | हर बंजारे का अपना, शहर नहीं होता || लौट आते हैं थक हार, जमाने में कुछ | ख्वाबों सा हसीं, हर सफ़र नहीं होता || उग जाते हैं रेगिस्तान में, प्यार के बीज | हर रिश्ता हमेशा तो, बंजर नहीं होता || जो मिला है 'दीप', उसे नियामत समझो| नींद के लिए जरूरी, बिस्तर नहीं होता ||

राह ए ज़िंदगी

ज़िंदगी लगी बेहद हसीं जब मुस्कुराकर देखा हमने | उनके ख्वाब  पलकों पे जब सजाकर देखा हमने || तकलीफ उनके दिल की समझ सका था न अब तलक | उदासी उनकी समझ में आई जब हँसाकर देखा हमने || कुछ दर्द पराये आज लगने लगे हैं मुझको पहचाने से | अश्क उनके मेरी पलकों से जब गिराकर देखा हमने || हालात के मारे कबसे भटकते रहे थे हम दर- बदर | समझ में आई ये ज़िंदगी जब उन्हें गंवाकर देखा हमने || कसूर किसको दें और किससे आज हम फरियाद करें | पाने की हसरत है समझा जो सब लुटाकर देखा हमने ||